किस घर में लक्ष्मी जी निवास करना पसंद करती है : अभी जाने

laxmi ji kahan rahti hai

हमारे शास्त्रों में उल्लेख है की स्वयं भगवती लक्ष्मी जी ने किसी वाक्य में यह कहा था की श्री कृष्णचन्द्र की महारानी रुक्मणि देवी तथा देवराज इंद्र को बताना की मुझे मेरे निवास स्थान से धाता, विधाता कोई भी नहीं हटा सकते लेकिन में स्वयं उन घरों को तुरंत छोड़ देती हूं. आइये जानते है लक्ष्मी जी के निवास स्थान के बारे में, घर में लक्ष्मी जी कहां रहती है ?

ऐसी बहुत सी बाते है, अशुभ आदते है जिनके कारण लक्ष्मी जी किसी के घर में निवास नहीं करती, इस तरह धीरे-धीरे उस घर में धन की कमी होने लगती है और ऐसे भी कई लोग है जो की सभी तरह के उपाय करते है लेकिन इन बताई जा रही बातों पर ध्यान नहीं देते.

जिससे लाख उपाय करने पर भी उनके घर में लक्ष्मी जी वास नहीं करती. तो आइये जानते है की लक्ष्मी जी किन घर में रहना पसंद करती है और किन घरो को वह तुरंत त्याग देती है. यह बाते स्वयं मां लक्ष्मी द्वारा शास्त्रों में बताई है है जो की इस प्रकार है.

Lakshmi Ji Ka Niwas Sthan Kaha Hota Hai

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घर में लक्ष्मी जी कहा रहती है निवास स्थान

  • जिस परिवार में विवाह के बाद पुत्र अपने वृद्ध माता पिता का पालन पोषण नहीं करते और उनका अनादर करते है में उस घर को त्याग देती हूं.

जिस घर में बहु सास ससुर आदि पूज्यजनो का कहना न मान कर मनमानी करती है. गृह स्वामिनी बनकर भी स्वयं घर का काम न कर के सास से घर का काम करवाती है.

अपने स्वामी पर तथा घर के अन्य पूज्य सम्बन्धियों पर शासन चलाती है. उन्हें उनका नाम ले लेकर पुकारती है. ऐसे घर को छोड़ कर में दूर चली जाती हूं.

  • जिस परिवार में छोटे अपने से बड़ो का सम्मान नहीं करते. अपने माता पिता वृद्ध, आचार्य और अतिथि या गुरु का सम्मान नहीं करते ऐसे घर से में विदा हो जाती हूं.
  • जिस घर में पिता अपनी दूसरी पत्नी के कहने पर क्रोध के आवेश में अपनी पहली पत्नी के किसी पुत्र को उसका उचित भाग न देकर उसे अलग कर देता है और उसे भोग से वंचिर कर देता है. उस घर में निवास कभी नहीं करती.
  • जो कन्या-विक्रय, आत्म-विक्रय, वेद-विक्रय, विद्द्या-विक्रय तथा देव-पूजा विक्रय करता है. उस घर से में तुरंत चली जाती हूं.

जहां गृहणी, मन, वाणी और कर्म से शुचिता पवित्रता का पालन नहीं करते है. धर्म की मर्यादा तोड़ कर मन माना आचरण कर जूते पहन कर भोजन बनाया जाता है. अभक्ष्य भोजन मांस अंडा आदि परोसा जाता है.

उस घर में में कभी नहीं ठहरती. जिस घर में भोजन ढंका हुआ नहीं रहता, चूहे और बिल्ली आदि खाने पिने की वस्तुए को झूठा करते हो, इधर उधर सामान बिखरा रहता है ऐसे घर को में त्याग देती हूं.

  • जिस घर में झूठे मुंह और हाथों से चीजों को छुआ जाता है. दूध आदि को ढंक-कर नहीं रखा जाता वहां में वास नहीं करती.
  • जिस घर में बड़े बूढ़ों और पोष्य वर्ग को भोजन कराये बिना आप अकेले भोजन कर लेते है. अपने लिए उत्तम भोजन तथा अन्य पौष्टिक खाद्द्य पदार्थ छोटे-छोटे बालकों के देखते ही स्वयं अकेले ग्रहण कर लेते है या छिपा लेते है ऐसे घर से में चली जाती हूं.
  • जिस घर में सूर्योदय होने के बाद बिस्तर से उठते हैं और सूर्योदय होने के बाद मल त्याग करते हैं सूर्य की की और मुंह करके लघु शंका और पेशाब करते हैं. उस घर में मेरा वास नहीं होता.
  • जिस घर में पुरुष स्त्रियों का वेश धारण करती हैं और स्त्रियां पुरुषों का वेश धारण किए हुए फिरती हैं मैं वहां से जल्द ही चली जाती जाती हूं.

  • जिस घर में घर की दीवार गिर जाने पर भी उसे तुरंत यानी जल्द ही नहीं बनवाया जाता तो उस घर को मैं छोड़ कर कहीं और चली जाती हूं.
  • जिस घर में पशुओं को आंगन में बांधकर उनको दाना, घास, भूसा और पानी आदि समय पर नहीं दिया जाता वहां पर मेरा वास नहीं होता है.
  • जिस परिवार में फैशन के नशे में आकर स्त्रियां अशुभ सूचक अपने बाल कटवा कर तथा काले और सफेद कपड़े आदि से अशुभ वेश धारण करती है मैं वहां नहीं ठहरती हूं.
  • जिस घर में ऋण लेकर चुकाया नहीं जाता तथा ऋण देकर एक-एक के तीन, चार चार लेने पर भी खाता बंद नहीं किया जाता, ऐसे स्थान से मैं चली जाती हूं.
  • जिस घर में बर्तन सुव्यवस्थित रूप में नहीं रखे जाते और रात का भोजन करने के बाद झूठे बर्तनों को मांज कर साफ करके नहीं रखा जाता और झूठे और अशुद्ध बर्तन रात भर रसोई में पड़े रहते हैं, ऐसे घरों को मैं छोड़ कर चली जाती हूं.

  • जिस घर में महिलाएं सोते समय अपने गहने संभाल कर नहीं रखती और इधर उधर कहीं भी रख देती है उस घर में मेरा वास नहीं होता.
  • जिस घर में रात में दही और सत्तू खाते हैं मैं उस घर को तुरंत छोड़ देती हूं.
  • जिस घर में धर्म मर्यादा का उल्लंघन कर मन माना आचरण किया जाता है, वहां मेरा वास नहीं होता.
  • जिस घर में टूटे बर्तन ,टूटी खाट, फटे आसन और वस्त्र तथा बर्तन इधर-उधर बिखरे रहते हैं वहां मेरी बड़ी बहन दरिद्रता का वास होता है.
  • जिस घर में चतुरता, सरलता, उत्साह, परम सौहार्द, क्षमा, सत्य, दान, तप, पवित्रता, नम्रता, दया, कोमल वाणी तथा मित्रों से प्रगाढ़ प्रेम आदि सब सद्गुण नहीं होते मैं वहां कभी वास नहीं करती.

  • जो भिक्षु को भिक्षा अतिथि को भोजन और देवताओ को निवेदन किए बिना भोजन कर लेता है वह मेरी बड़ी बहन दरिद्रता का निवास होता है.
  • मेरी ही विभूति गृह लक्ष्मी का जहां तिरस्कार किया जाता है, दू-व्यवहार किया जाता है अथवा वह मारी पीटी जाती है ऐसे घर में मेरा वास कैसे हो सकता है.
  • जिस परिवार में निद्रा, आलस्य, अप्रसन्नता, दोष, दृष्टि, विवेक, संतोष, निषाद और कामना आदि दोष रहते हैं वहां में वास नहीं करती.
  • जिस घर में स्त्रियां चाकू, हँसिया, संदूक, आटा, कांसे के बर्तन खाद पदार्थ द्रव्यमान आदि वस्तुओं को संभाल कर नहीं रखती उस घर को भी मैं छोड़ कर चली जाती हूं.
  • जिस घर में दिन-अनाथ, वृद्ध दुर्बल रोगी बालक और स्त्रियों पर दया नहीं की जाती यहां भी मैं वास नहीं करती और ना ही ठहरती हूं.
  • जिस घर को रोजाना साफ नहीं किया जाता वहां मेरी बहन दरिद्रता रहने लगती है. मैं उस घर को छोड़ देती हूं.
  • जिस घर में पित्र श्राद्ध नहीं किया जाता वहां भी मेरा वास नहीं होता है.

जो दिन में अपनी पत्नी से मैथुन करता है, गिले पांव नंगा होकर सोता है, सूर्योदय के समय और शाम के समय सोता है, नहाने के बाद सूर्य को अर्ध्य नहीं देता है मैं उस घर में वास नहीं करती हूं, वहां से चली जाती हूं मेरे जाने पर वहां से आशा, श्रद्धा, शांति, समृद्धि यह सब चली जाती है और इनके जाने से उस घर में दरिद्रता, कलह, अशांति, असंतोष और कई तरह की विपत्तियां आने लगती है.

  • इसके बाद भगवती लक्ष्मी जी कहती है, भगवान् नारायण द्वारा श्री ब्रह्मा जी और अन्य देवताओ को बताना की वरदा, पुत्रदा, धनदा, सुखदा, मोक्षप्रद, सम्पूर्ण मंगलो को भी मंगल प्रदान करने वाली मेरी प्राण प्रिय लक्ष्मी उस स्थान, घर और परिवार में निवास नहीं करती है.
  • जहां शंख की ध्वनि नहीं होती है, जहां मेरी परम प्रिय तुलसी का निवास नहीं होता है, जहां ब्राह्मणों को भोजन नहीं कराया जाता है, जिस घर में मेरे भक्तों की निंदा होती है. वहां रहने वाली मां लक्ष्मी के मन में अपार क्रोध उत्पन्न हो जाता है और वह उस स्थान को छोड़कर चल देती है.

  • जिस घर में लक्ष्मी नारायण की उपासना नहीं होती है, जिस घर में एकादशी और जन्माष्टमी आदि शुभ व्रतों पर अन्न भक्षण होता है, उन व्यक्तियों के घर से लक्ष्मी चली जाती है.
  • जो मेरे नाम का और अपनी कन्या या अपनी बहन का विक्रय करता है, जहां अतिथि भोजन नहीं पाता है उस घर को मेरी लक्ष्मी जी तुरंत त्याग कर चली जाती है.

जो कायर व्यक्तियों का अन्न खाता है, अपने नाख़ून से पृथ्वी कुरेदता रहता है, जो व्यक्ति सुबह होते वक्त और शाम होते वक्त भोजन करता है या इस समय पर सोता है, दिन में सोता है और मैथुन करता है, जो दुराचारी होता है ऐसे मनुष्य के घर को भी लक्ष्मी छोड़ कर चली जाती है.

  • जो व्यक्ति भीगे पैर और नंगा होकर सोता है, नग्न होकर स्नान करता है उसके घर में लक्ष्मी का वास नहीं होता है.
  • जो सिर पर तेल लगा कर उसी से दूसरे अंगों को स्पर्श करता है, अपने सिर का तेल दूसरे को लगाता है और अपनी गोद में बाजा लेकर उसे बचाता है. उस घर से लक्ष्मी रुष्ट होकर चली जाती है.

  • जिस घर में शिवलिंग, शालिग्राम, महालक्ष्मी, महासरस्वती और महादुर्गा आदि का रोजाना पूजन नहीं होता है, वहां भी लक्ष्मी का वास नहीं होता है.
  • जिस परिवार में रोजाना प्रभु का भजन कीर्तन नहीं होता वहां महालक्ष्मी कभी नहीं रुकती है.
  • जिस कुटुंब के सदस्य सत्य, दान, तप, शील और धर्म परायण नहीं होते वहां भी लक्ष्मी जी बिलकुल वास नहीं करती है.

तो इस तरह बताई गई बातों का विशेष ध्यान रखे, घर में लक्ष्मी जी का निवास स्थान, laxmi ji ka niwas sthan in Hindi यही होता है, जिस घर में इन सभी बातों को ध्यान में रखा जाता है, वह दिनों दिन तरक्की करता है और धन की भी कोई कमी नहीं आती.

कई लोग इन बातों पर ध्यान नहीं रखते इसीलिए उनके घर में धन स्थिर नहीं रहता, दरिद्रता आती रहती और वह शांति से जीवनयापन भी नहीं कर पाते. अब आप भी अपनी गलतियों को सुधारे और इन बातों का ध्यान रखे. साथ ही इस वीडियो को सभी तक पहुंचाए ताकि सभी यह जानकारी हासिल करे सके.

चमत्कारिक धन आने के उपाय : 21 दिन में धन आने लगेगा (टोटके)

dhan aane ke upay batayee totke aur mantra in Hindi me

यहां हम ऐसे एक सरल धन आने के उपाय यानी लक्ष्मी प्राप्ति टोटके के बारे में बताने वाले हैं, जिसको रोजाना करने पर चारों तरफ से धन आने लगेगा, नए-नए मार्ग खुलेंगे. इसके लिए आप यह Post पूरा और आखिरी तक जरूर पड़ें. यह प्रयोग हम खुद भी करते हैं. इसके प्रभाव से लक्ष्मी जी जल्द प्रसन्न होती है.

धन की जरुरत किसे नहीं होती, धन आज के युग में सबसे महत्वपूर्ण हो गया है. ऐसे कई व्यक्ति है जिन्हे धन की कमी रहती है, वह काम भी बहुत करते है लेकिन उन्हें उसके मुताबिक पर्याप्त धन नहीं मिलता. इसके पीछे कई दोष होते है, ऐसे लोगों पर लक्ष्मी जी की कृपा नहीं होती.

धन आने के लिए “dhan aane ke totke mantra” में हम यहां आपको एक ऐसे स्त्रोत के बारे में बताने जा रहे है, जिसे रोजाना करने पर ढेर सारे धन की प्राप्ति होती है, धन की कभी कमी नहीं होती, मान सम्मान बढ़ता है, परिवार में सुख समृद्धि बढ़ती है, जीवन की परेशानियां कम होती है इस स्त्रोत को करने में सिर्फ 5 मिनट लगते है, बदले में यह आपको लक्ष्मी जी की अनंत कृपा दिलवाता है.

सिर्फ 21 दिन करके देखे

शायद आपको यह जानकर हैरानी हो रही होगी, लेकिन आप खुद 21 दिनों तक इस स्त्रोत को रोजाना करना शुरू करे आपको खुद को इसका असर आभास होने लगेगा.

अभी तक के जितने भी मंत्र और उपाय हैं उनमे से सबसे ज्यादा यह बताये जा रहा स्त्रोत प्रभावी और शीघ्र फलदाय हैं. हमसे कोई लोगों ने पूछा धन आने लिए उपाय बताये जो की सरल और रोजाना किया जा सके, तब हमने उन्हें यह धन आने के टोटके से भी बेहतर तरीका बताया.

Dhan Aane Ke Upay in Hindi

dhan aane ke upay batayee totke aur mantra in Hindi me

Dhan Aane Ke Totke Bataye Kya Kare ?

इस कनकधारा स्त्रोत पाठ की शुरुआत आप शुक्लपक्ष के पहले शुक्रवार से करें. इसके लिए किसी विशेष विधि-विधान की भी आवश्यकता नहीं होती हैं.

सूती आसान पर पूर्व दिशा की तरफ मुंह करके बैठ जाए और अपने पुरे मन को लगाकर ऐसे पाठ करे जैसे की स्वयं लक्ष्मी जी आपके सामने बैठी हो और आप उन्हें यह पाठ सुना रहे हो. आप जितनी तल्लीनता से इस स्त्रोत का पाठ करेंगे आपको उतना ही ज्यादा लाभ होगा.

पाठ करने के बाद माँ लक्ष्मी को मानसिक रूप से प्रणाम करें, यानी मन ही मन माँ लक्ष्मी को प्रणाम करे और अपने स्थान से उठ जाए. अगर आपकी कोई कामना हैं, आप लक्ष्मी जी से कुछ मांगना चाहते हो तो आप पाठ के बाद हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए अपने मन मैं लक्ष्मी जी को प्रणाम करते हुए उनसे अपनी कामना, इच्छा कह दें.

अगर आप कुछ नहीं मांगना चाहते तो सिर्फ प्रणाम कर ले लक्ष्मी जी खुद आपकी सभी कामनाओ को पूरा करेंगी (one strot money problem solution in Hindi).

चलिए आगे हम बताते है की कैसे कनकधारा स्त्रोत की उपत्ति हुई और फिर इसके बाद हम कनकधारा स्त्रोत बताएंगे.

कनकधारा यन्त्र..

वैसे हम बता दे अगर आप इस स्त्रोत से तत्काल फल प्राप्त करना चाहते है तो सबसे पहले कनकधारा यन्त्र का निर्माण करवाए और फिर उसकी पूजा कर, उसे सिद्ध कर ले इसके बाद कनकधारा स्त्रोत के साथ पूजा पाठ करे, इससे दुगने लाभ मिलेंगे, स्वयं सिद्धि और ऐश्वर्या की प्राप्ति भी होगी.

kanakdhara yantra

इसके लिए सबसे पहले चांदी की धातु पर कनकधारा यन्त्र बनवाये, फिर उसे पूजा पाठ के पवित्र स्थान पर पिले कपडे को बिछाकर उसके ऊपर इस यन्त्र को रख दें. फिर रोजाना इस यन्त्र के सामने बैठ कर ही कनकधारा स्त्रोत का पाठ करे तो तत्काल फल मिलेगा.

आप अपने क्षेत्र के किसी विद्वान पंडित के द्वारा कनकधारा यन्त्र को बनवाने के बाद सिद्ध करवा ले और पूजा के स्थान पर रखवा ले फिर वही उसी जगह बैठ कर इस स्त्रोत का पाठ करे.

इस स्त्रोत की महिमा..

कनकधारा स्त्रोत की रचना जगद्गुरु शंकराचार्य ने उस समय की थी जब वे भिक्षा मांगने के लिए एक निर्धन धर्मपरायण ब्राह्मण के दरवाजे पर पहुंचे. वह ब्राह्मण इतने निर्धन थे की उस समय उनके पास भिक्षा में देने के लिए कुछ भी नहीं था.

ब्राह्मण की पत्नी अपनी इस विपन्नता पर असहाय हो कर रो पड़ी. उसकी इस दिन-दशा को देख शंकराचार्य जी का हृदय पसीज उठा. वे वही स्वनिर्मित स्त्रोत का पाठ कर लक्ष्मी देवी का स्तवन करने लगे.

उनकी करुणामयी आवाज एक स्त्रोत के रूप में प्रस्फुटित हुई, जिससे लक्ष्मी जी ने परम प्रसन्न हो उन्हें तत्काल दर्शन दिया और स्तवन का कारण पूछा.

शंकराचार्य जी ने ब्राह्मणी की धर्म परायणता और विपन्नता का वर्णन करते हुए उसकी दरिद्रता को दूर करे की प्राथना की. देवी लक्ष्मी जी ने कहा – वत्स, यद्द्पि इसके भाग्य में इस जन्म में वैभव लिखा ही नहीं है, फिर भी तुम्हारे इस स्त्रोत ने इसके भाग्य लेख को बदल दिया है.

आगे लक्ष्मी जी बोली की इस ब्राह्मण के घर में एक कनकधारा यन्त्र को रख कर उसका पूजन कर वहीं स्त्रोत जो तुमने रचा है का पाठ इस ब्राह्मण को करना होगा. शंकराचार्य जी ने उस गरीब ब्राह्मण के कल्याण के लिए ठीक ऐसा ही किया और स्वरचित स्त्रोत “कनकधारा स्त्रोत” ब्राह्मण को दे दिया.

जिससे कुछ ही दिनों में उस गरीब ब्राह्मण के घर में स्वर्ण मुद्रा की वर्षा हुई. उस ब्राह्मण परिवार की दरिद्रता हमेशा के लिए समाप्त हो गई.

तो इस तरह इस धन आने के उपाय में आज भी यह कनकधारा स्त्रोत उतना ही प्रभावी है, इसको रोजाना करने पर अपार धन आने लगेगा, यानी कहीं से भी किसी न किसी के जरिये धन आना शुरू हो जायेगा. आइये अब आगे कनकधारा स्त्रोत के बारे में बताते है.

हम इस स्त्रोत को संस्कृत और उसके अर्थ सहित हिंदी भाषा में निचे दे रहे है. आप अपनी इच्छा अनुसार संस्कृत या हिंदी दोनों में से किसी भी भाषा में इस स्त्रोत का पाठ कर सकते है.

ज्यादातर व्यक्तियों को संस्कृत में इसका पाठ करने में परेशानी होगी इसीलिए हिंदी में भाषा में भी इस स्त्रोत को दिया है, निचे देखे. लेकिन बेहतर होगा आप संस्कृत भाषा में ही इसका पाठ करे, क्योंकि संस्कृत देवों की भाषा होती है.

धन के लिए कनकधारा स्त्रोत हिंदी अनुवाद

जैसे भँवरी अधखिले फूलों से संचति तमाल के वृक्ष का आश्रय लेती है, वैसे ही कल्याणकारिणी लक्ष्मी की जो कटाक्ष लीला विष्णु भगवान के रोमांच से विभूषित शरीर से सम्बद्ध है और जो सभी विभूतियों से युक्त है, वह मुझे मंगलदायिनी हो॥

जैसे भँवरी विशाल कमल पर बार बार आती जाती रहती है, वैसे ही मुरारी विष्णु के मुख की ओर समुद्र-जन्मा लक्ष्मी की जो दृष्टि माला प्रेमवश बारम्बार जाती है और लज्जा वाश लौट आती है, वह मुझे श्री (ऐश्वर्य) प्रदान करे॥

जो सभी देवों के स्वामी इन्द्र के पद का वैभव देने में समर्ध है, मुरारी विष्णु को भी जो अति आनंदकारिणी है, जो निल कमल के भीतरी भाग जैसी मनोरम है, वह लक्ष्मी जी की अधखुली आँखों की दृष्टि पल भर के लिए कुछ मुझ पर पड़े॥

शेषनाग पर सोने वाले विष्णु की पत्नी लक्ष्मी जी का नेत्र मुझे ऐश्वर्यदायक हो, जिसकी पुतली और बरौनिया कामवश हो, अधखुली किन्तु एकटक दृष्टि से देखने वाले आनंद-मूल श्री मुकुंद को अपने पास पाकर तिरछी हो जाती है॥

जो मधु असुर को जितने वाले श्री विष्णु के कौस्तुभ मणि से शोभित वक्ष:स्थल पर इंद्रनीलमयी हारावली जैसी शोभा पाती है और जो भगवान के भी मन में काम को उत्पन्न कर देती है, कमलालया लक्ष्मी की वह कटाक्ष माला मेरा कल्याण करे॥

जैसे बादलों में बिजली चमकती है, वैसे ही जो कैटभासुर के शत्रु श्री विष्णु के काली मेघमाला के समान श्याम वारं सुन्दर वक्ष पर प्रकाशित होती है और जो सभी लोको की माँ है, उन भार्गव नन्दनी लक्ष्मी की पूजनीया मूर्ति मेरा कल्याण करे॥

मगरों के निवास स्थान समुद्र से उत्पन्न कन्या (लक्ष्मी) की वह मंद, अलसायी हुई, मन्थर और अधखुली दृष्टि, जिसके प्रभाव से कामदेव ने माग्डलमय मधुसूदन श्री विष्णु के हृदय में पहले-पहल स्थान पाया था, इस संसार में मुझ पर पड़े॥

श्री नारायण की प्रेयसी लक्ष्मी का नेत्ररूपी बादल, दयारूपी अनुकूल हवा से चलता हुआ, दुष्कर्मरूपी धुप को सदा के लिए दूर कर दुःख में पड़े हुये मुझ दरिद्र-रूपी पक्षी-शिशु पर धन रूपी जलधारा की वर्षा करे॥

विशेष बुद्धिमान लोग जिनके भक्त होकर उनकी दयालु दृष्टि के प्रभाव से देव-पद को सहज ही पा लेते है, उन कमलासन लक्ष्मी की खिले हुये कमल की भीतरी भाग जैसी शोभावली दृष्टि मुझे अभीष्ट पोषण प्रदान करे॥

जो सृष्टि के समय सरस्वती, स्थिति-काल में गरुड़-ध्वज श्रीविष्णु- पत्नी लक्ष्मी और प्रलय-लीला के समय चंद्रशेखर श्रीशिव-प्रिया दुर्गा (शाकम्भरी) के रूप में स्थित होती है, उन त्रिभुवन के एकमात्र गुरु भगवान नारायण की सदा युवावस्था में रहने वाली प्रिया श्री लक्ष्मी को नमस्कार है॥

शुभ कर्मो का फल देने वाली श्रुति को नमस्कार है, मनोहर गुण-सागरा रति को नमस्कार है, कमल-वासिनी शक्ति को नमस्कार है, पुरुषोत्तम की प्रिया पुष्टि को नमस्कार है ॥

पद्यानना लक्ष्मी को नमस्कार है, क्षीर सागर से जन्मी श्री को नमस्कार है, चन्द्रमा और अमृत की बहन लक्ष्मी को नमस्कार है, नारायण की प्रिया को नमस्कार है॥

स्वर्ण-कमल की पीठ पर विराजमान लक्ष्मी को नमस्कार है, भूमण्डल की स्वामिनी कमला को नमस्कार है, वेदों पर दया करने वाली लक्ष्मी को नमस्कार है, शाङ्ग-शस्त्र-धारी श्रीविष्णु की प्रिया को नमस्कार है॥

भृगु ऋषि को आनंदित करने वाली देवी को नमस्कार है, श्री विष्णु के वक्ष पर स्थित रहने वाली लक्ष्मी को नमस्कार है, कमलवासिनी लक्ष्मी को नमस्कार है, दामोदर प्रिया को नमस्कार है॥

कमल-नेत्रा कान्ति को नमस्कार है, भुवनों की जननी विभूति को नमस्कार है, देवादि सभी के द्वारा पूजित लक्ष्मी को नमस्कार है, नन्द-पुत्र श्रीविष्णु की प्रिया को नमस्कार है॥

हे कमल-नयना पूजा माँ! आपकी स्तुतियाँ संपत्ति देनी वाली, सभी इन्द्रियों को आनंददायिनी, साम्राज्य-वैभवकारिणी, पापों को दूर करने वाली हैं, वे मुझे सदा ही अपनाएं (मैं सदा ही आपकी स्तुतियां करता रहूं)॥

जिनकी कृपा-दृष्टि की उपासना-विधि भक्त को सभी अर्थ और संपत्ति-दायिनी हैं, उन्हीं विष्णु-प्रिया लक्ष्मी को मैं वाणी, शरीर और मन से भजता हूं॥

हे भगवती विष्णु प्रिये! कमल-वासिनी, कमल-हस्ते ! उज्जवल-वस्त्र-गन्ध-मालाधारिणी ! मनोरमे ! त्रिलोकैऐश्वर्यदायिनी ! मुझ पर प्रसन्न हो॥

दिग्गजों द्वारा स्वर्ण-कलशों के मुख से गिराए गए आकाश-गंगा के स्वच्छ सुन्दर जल से अभिषिक्त शरीर वाली जगज्जननी को, जोसभी लोगों के स्वामी विष्णु की गृहणी और सुधा-सागर की पुत्री हैं, मैं प्रातः काल नमस्कार करता हूं॥

हे कमले ! कमल-नेत्र-विष्णु-प्रिये ! दिनों मैं अग्रगण्य मैं दया का वास्तविक अधिकारी हूं। मुझे आप अपनी करुणापूर्ण दृष्टि से देखें॥

उक्त स्तुतियों से जो प्रतिदिन वेद-त्रय-स्वरूपा त्रेलोक्य-जननी लक्ष्मी की स्तुति करते हैं, वे पृथ्वी पर अति गुणी, बहु-भाग्यशाली होते हैं और विज्ञ भी उनके विचारों को मानते हैं॥

कनकधारा स्त्रोत संस्कृत भाषा में..

kanakdhara strotam

 

kanakdhara strotam part 2

इस तरह से आप सुबह स्नान करने के बाद पवित्र स्थान पर पूर्व दिशा की तरफ मुंह करके सूती आसान पर बैठ जाए और लक्ष्मी जी को मानसिक प्रणाम करे फिर इस कनकधारा स्त्रोत का 3 बार पाठ करे, आप एक बार भी कर सकते हैं. लेकिन तीन बार करना अति शुभ होता हैं.

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धन आने के उपाय वीडियो इन हिंदी (Video)

दोस्त धन पाने के लिए और भी उपाय है, लेकिन यह सबसे सरल और प्रभावी है. यह आपको जरूर फल देगा, हम खुद इसका नियमित प्रयोग करते है.

उम्मीद करते है आपको यह dhan aane ke upay bataye in Hindi, धन आने के टोटके के इस पोस्ट को पढ़कर अच्छा लगा होगा और उम्मीद है की आप इसे करेंगे, भरपूर लाभ प्राप्त करेंगे. हमसे जुड़े रहे ताकि आपको और भी जानकारी मिलती रहे.

धन आने के मार्ग खोलने के लिए आप इस स्त्रोत का पाठ करना शुरू करे, यह बहुत ही शक्तिशाली हैं.